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भैय्या यूनिवर्सिटी रोड चलेंगे ?

हाँ वही भैय्या !

वैसे तो इलाहाबाद माहिर ही है हर जगह को हर कोने को अपना बनाने में , इस शहर में पता ही नहीं चलता कि कब कौन सा कोना अपना घर बन जाता है, कब रोज आते जाते, कोई अजनबी से अपना निजी रिश्ता निकल आता है ,यहां के लोगों की तमाम खासियतों में ये भी एक बेहद प्यारी कला है यहां रिश्ते बनते बिल्कुल भी देर नहीं लगती ऐसा ही कुछ अपनापन दिया है , इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने एक मामूली सी सड़क को , अरे जरा धीमे पढ़िए किसी विद्यार्थी को अगर भनक लग गई की उस सड़क को मामूली कहा जा रहा तो बात बिगड़ सकती है। जी हां हम बात कर रहें यूनिवर्सिटी रोड की , सुबह सुबह भागते दौड़ते हर यूनिवर्सिटी जाने वाले विद्यार्थी के मन में एक ही नाम आता है कि किसी तरह रिक्शा वाला बस यूनिवर्सिटी रोड छोड़ दे उसके आगे डिपार्टमेंट तक की दूरी तो हम तय कर ही लेंगे हालांकि इस सड़क का आनंद कला संकाय वाले विद्यार्थी कम ले पाते हैं। लल्ला चुंगी से सीधे जाते हुए कला संकाय की चहल पहल लिए और हॉलैंड हाल और यूनियन हाल का भौकाल लिए हुए सालों से इस सड़क ने कई विद्यार्थियों को बड़े बड़े वैज्ञानिक और अफसरों में तब्दील होते देखा है , क्या कुछ नहीं देखा है इस सड़क ने चाहे वो किसी छात्रावास के लड़को की मार पीट हो , या फिर यूनियन हाल के बाहर लग रहे छात्र संघ के नारे हो ,देखा जाए तो विश्विद्यालय की गतिविधियों का इस सड़क से बड़ा गवाह अभी तक नहीं आ सका है , और शायद आ भी नहीं पाएगा। किसी को कब पता था कि ये सड़क देखते ही देखते इन विद्यार्थियों का घर बन जायेगी । मतलब कोई भी ऐसा विद्यार्थी  तो शायद ही होगा जिसने इस रोड पे कदम ना रखा हो , देखा जाए तो आपके विश्विद्यालय के परिचय पत्र के साथ आपका इस रोड पर आने का भी रास्ता खुल जाता है। छात्रावास के हर युवा लड़के की भौकाल में तड़का लगाने वाली लाइन तो यहीं से शुरू होती है ना ” जो भी होगा देख लेंगे यूनिवर्सिटी चौराहे पे ” फिर वो चौराहे का छोला भटूरा 15 मिनट के ब्रेक में भी हर विद्यार्थी यहां तक आकर उसे खाने का समय निकाल ही लेता है । सच्चाई बोली जाए तो इस सड़क पर चलते हुए जैसे मंजिल की दूरी ही खत्म हो जाती है , और आखिर में जब छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थी जब ये शहर छोड़ते हैं तो वो सिर्फ कॉलेज और दोस्तों के लिए ही नहीं आँखें नम करता यहां से आखिरी बार गुजरते वक्त हर विद्यार्थी एक बार तो सोचता ही है कि काश वो दिन वापस आ जाए जब इस सड़क से पहली बार सामना हुआ था , काश बस एक बार फिर से इस सड़क से पहली बार गुजरना मुमकिन हो , काश एक बार फिर से वो ब्रेक आ जाएं जिसमें इस चौराहे पर आने का पर्याप्त समय होता था , खैर समय कहां रुकता है पर हां इतना तो तय है कि इलाहाबाद विश्विद्यालय के विद्यार्थियों की पढ़ाई और मंजिल के बीच का जो रास्ता है वो गुजरता जरूर है इसी यूनिवर्सिटी रोड से होकर ।

तो भैय्या यूनिवर्सिटी रोड चलेंगे ?

लेख – चेतांशी त्रिपाठी

Written by AU Beat Media

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