प्रयागराज में रबीन्द्रनाथ टैगोर की रचना ‘गीतांजलि’ का गवाह शांता निवास हुआ ज़मीदोंज

गुरुदेव रबिंद्र नाथ टैगोर की अमरकृति गीतांजलि का गवाह रहा शांता निवास का अस्तित्व अब खत्म हो गया। जार्जटाउन में अमरनाथ झा मार्ग स्थित इसी मकान में गुरुदेव ने अपनी कृति गीतांजलि की गीताली राज महल जैसी अमर कविताओं की रचना की। दूर दराज से आने वाले लोग इस मकान को देखते थे, लेकिन अब मकान उस स्वरूप में लोगों को दिखाई नहीं देगा। दशकों तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता रहे प्यारेलाल बनर्जी का शांता निवास हर किसी के आकर्षण का केंद्र था। बांग्ला साहित्यकार यहां आकर रुकते थे। बांग्ला त्यौहार यहां धूमधाम से मनाया जाता था। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान शारदीय नवरात्र पर शांता निवास में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करके विधि-विधान से पूजन किया जाता था। लेकिन, बंगला गिरने के साथ सारी स्मृतियां भी जमींदोज हो गईं।

शांता निवास, प्रयागराज

गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की भतीजी शांतादेवी का विवाह 1888 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के चर्चित अधिवक्ता प्यारेलाल बनर्जी से हुआ था। प्यारेलाल ने अमरनाथ झा मार्ग (पूर्व में हेमिल्टन मार्ग) में 1898 में करीब पांच बीघा जमीन ली थी। उसके बीच में 1901-02 में शांता निवास नामक बंगला बनाया था। नजूल की भूमि पर बंगला नंबर 41 था।

साहित्यिक चिंतक प्रो. एमसी चट्टोपाध्याय बताते हैं कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर अक्टूबर 1901 में पहली बार प्रयागराज आए थे। यहीं उन्होंने चर्चित कृति गीतांजलि का शुरुआती अंश लिखा था। इसके लिए उन्हें 1913 में नोबल पुरस्कार मिला था। गुरुदेव कुल पांच बार प्रयागराज आए। चार बार शांता निवास में ठहरे। 

गीतांजलि

 1908 से 1923 तक उनकी दर्जनों रचनाओं का प्रकाशन इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से ही हुआ।

Written by AU Beat Media

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