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शान-ए-इविवि : फिराक गोरखपुरी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अँग्रेजी विभाग के प्रोफेसर, अपने विषय के प्रकांड विद्वान, अज़ीम शायर और अप्रतिम व्यक्तित्व वाले प्रो. रघुपति सहाय “फिराक गोरखपुरी” पर कुछ लिखना न केवल बेहद दुरूह काम है वरन सूरज को दीपक दिखाने जैसा ही है।

उनका जन्म 1896 में गोरखपुर में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी, ऊर्दू और फारसी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उनका चयन प्रांतीय सेवा तथा I.C.S. दोनों में हुआ लेकिन महात्मा गाँधी के आह्वान पर फिराक साहब इस्तीफ़ा देकर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े जिसके कारण मलाका जेल में उनपर मुकदमा चला और डेढ़ साल की सजा हुई।

फिराक गोरखपुरी

पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने उन्हें इलाहाबाद के AICC के कार्यालय में अनु सचिव की 250 रूपये की नौकरी दिला दी। फिर वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्रोफ़ेसर हो गये। अपने विषय के वे प्रकांड विद्वान थे अंग्रेजी के कालजयी रचनाकार Wordsworth एवं Byron पर उन्हें महारत हासिल थी। उनके बारे में एक किस्सा मशहूर है कि Wordsworth की एक कविता को वे दो साल तक पढ़ाते थे और उसके पश्चात छात्रों को Wordsworth की किसी भी कविता को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। अँग्रेजी ,ऊर्दू तथा हिंदी साहित्य पर उन्होंने कई लाजवाब गद्य रचनायें लिखीं। उन्होंने “साधु और कुटिया” नाम का एक उपन्यास भी लिखा।

लेकिन फिराक साहब को असली पहचान और ख्याति ऊर्दू साहित्य में उनके बेमिसाल योगदान के लिए मिली। उन्होंने ऊर्दू शायरी की एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं “गुले नगमा”, “मशाल” ,”रुहे कायनात”, “रूप”, “शबनमिस्तान”, “सरगम”, “बज्मे जिंदगी रंगे शायरी”, “हजार दास्तान आदि। फिराक को मोहम्मद इक़बाल, जिगर मुरादाबादी, जोश मलीहाबादी के स्तर का शायर माना जाता है। फिराक ने पहली बार हिंदू संस्कृति को भी ऊर्दू गजल में कमाल के साथ पिरोया था।

“दिलों में तेरे तब्बसुम की याद यूँ आयी, जगमगा उठे जिस तरह मंदिरों में चिराग”
“हर लिया है किसी ने सीता को जिंदगी जैसे राम का वनवास “

ऊर्दू शायरी में अँग्रेजी साहित्य की रुमानियत/ Romanticism को भी फिराक ने बड़ी खुबसूरती से पिरोया।

“कमल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग”
उनकी रुबाइयों में सूरदास के कृष्ण के बालरूप का भी अद्भुत चित्रण है –
“आंगन में ठुनक रहा जिदियाया है,
बालक तो भई चाँद पे ललचाया है,
दर्पन उसे दे के कह रही है माँ,
देख आईने में चाँद उतर आया है “

उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रची बसी हुई थी।

“गुले नगमा” पर उन्हें साहित्य का सर्वोच्च सम्मान “ज्ञानपीठ पुरस्कार ” मिला।रिटायर होने के बाद वे UGC Research Professor हुये, उन्हें AIR का Emeritus Producer का सम्मान भी मिला, फिराक गोरखपुरी को “सोवियत लैंड नेहरु अवार्ड “, “साहित्य अकादेमी फेलोशिप” ,” गालिब एकेडमी अवार्ड” से भी नवाज़ा गया। 1968 में फिराक साहब को “पद्म भूषण” से सम्मानित किया गया और 1997 में भारत सरकार ने उनपर डाक टिकट भी जारी किया।

1997 में जारी डाक टिकट

फिराक साहब जैसे प्रकांड विद्वान और मनीषी ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पहचान रहे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नायाब रत्न फिराक गोरखपुरी जी को कोटि-कोटि नमन्।

लेख: डॉ० अरुण हेम

Written by AU Beat Media

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