in

इलाहाबाद ब्लूज: युवाओं के सपनों के संघर्षों की कहानियाँ कहती है ये किताब

इलाहाबाद ब्लूज’ कहानी है उन तमाम किसान,अध्यापक,बैंक मैनेजर, क्लर्क , चपरासी, प्राइवेट कर्मचारियों के बेटे-बेटियों की, जो कभी इलाहाबाद मे संगम के किनारे से अस्ताचल सूरज को टकटकी लगाये तो कभी लखनऊ मे गोमती के किनारे से छतर मंज़िल को निहारते हुए , कभी मथुरा मे यमुना मे कंकण फेंक कर उसकी गोलाकार जलधाराओ को गिनते हुए तो कभी दिल्ली मे नेहरु विहार की पुलिया पार करते उस सुगंधित समीर का आनन्द लेते और कभी अपने गावँ की उस बेतरतीब बहती हुई नहर के किनारे टहलते हुए- जीवन के तमाम अन्तर्द्वन्दों – अन्तर्विरोधों के बावजूद अपने स्वप्नों को खुली आंखो से देखने का ना सिर्फ साहस करते है बल्कि उन्हें परिणिति तक भी पहुचाते हैं।

सार यह है कि जो भी इसे पढेगा उसे ये अपनी लगेगी । आपको इसमे अपना बचपन दिखेगा, पुराना स्कूल दिखेगा, पहला प्रेम दिखेगा, वो प्रेम पत्र भी दिखेगा जिसके कुछ अछर किसी के अश्रुओं से धुल गये थे और आप आज तक उनका मायने समझने की कोशिश कर रहे हैं , कॉलेज के बाहर की चाय की दुकान , क्रिकेट का वो मैदान ,वो बस ,वो ट्रेन ,पसंदीदा किताब की दुकान और पुस्तकालय- वो सब दिखेगा जो आप अभी भी कभी गाड़ी मे बैठकर उसके शीशे से बाहर देखते हुए और कभी रात को निस्तब्धता से लेटे खुली आंखो से छत को निहारते हुए सोचते रहते हैं। यह सच है कि समय कभी लौटकर नही आता हालाकि वो अलग बात है कि गज़ले और शेर दिलासा देते रहे हैं कि “तारीख हमेशा अपने को दोहराती है…” और इसी तरह आपकी अपनी तारीख ‘इलाहाबाद ब्लूज’ मे दोहरायी गयी है । अतीत की स्मृतियां जो आपके मन के किसी खोह मे छुपी बैठी हैं वो जीवन्त हो उठेंगी और ये भी हो सकता है कि कहीं किसी पन्ने को पढ़ते हुए आपके नेत्रों के कोर भीग जायें और रोकने की लाख कोशिशो के बावजूद होठो के कोर भी कम्पायमान हो उठें । अगर आपने कभी जावेद अखतर की नज़्म ” वो कमरा याद आता है” पढी होगी तो मेरा दावा है कि उसका चित्रांकन आप इस पुस्तक मे पायेंगे। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति की है जो पिता से पिटा भी है और पिता जिसके सर्वोच अभिमान भी हैं। अज्ञेय ने सही कहा था कि हर व्यक्ति का जीवन एक उपन्यास है, लेखक मे तो बस इतनी कला है कि वह आपबीती को जगबीती बना देता है । इलाहाबाद ब्लूज आपकी अपनी आपबीती है।

पढ़ने वालों की कमी हो गयी है आज इस ज़माने में,
नहीं तो गिरता हुआ एक-एक आंसू पूरी किताब है।

इलाहाबाद ब्लूज:
लेखक – अंजनी कुमार पांडेय
प्रकाशन – हिंदयुग्म प्रकाशन

Written by AU Beat Media

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Loading…

0

दिल बेचारा रिव्यू : आखिरी फिल्म में भी जीना सीखा गया हीरो

यूपी बी.एड की परीक्षा तिथि आने के बाद इविवि छात्रसंघ पर छात्रों का काली पट्टी बांधकर विरोध