in

आज़ाद थे, आज़ाद हैं और आज़ाद रहेंगे – आज़ाद जयंती पर विशेष

आज़ाद का पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था, इनका नाम 23 जुलाई, 1906 को उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बदरका गांव में 1906 में हुआ था लेकिन इनका पूरा बचपन एमपी में बीता। 1922 में चंद्रशेखर की मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई और चंद्रशेखर क्रांतिकारी बन गये। चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन किया और भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के साथ अंग्रेजी हुकूमत में दहशत फैला दी। आजाद के नाम से अंग्रेजी हुकूमत में इतनी दहशत थी कि पुलिस की एक्का दुक्का टुकड़ी सूचना मिलने के बाद छापेमारी में भी दहशत खाती थी। 

साथियों से क्या कहते थे आजाद:

“गिरफ़्तार होकर अदालत में हाथ बांध बंदरिया का नाच मुझे नहीं नाचना है। मेरी पिस्तौल में आठ गोली हैं और आठ की दूसरी मैगजीन भी है। पन्द्रह दुश्मन पर चलाऊंगा और सोलहवीं खुद पर !” “लेकिन जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आउंगा। जिंदा रहते हुये अंग्रेज मुझे हाथ भी नहीं लगा पायेंगे आजाद हूं और आजाद रहूंगा “- चंद्रशेखर आज़ाद !

प्रयागराज संग्रहालय में रखी आज़ाद की पिस्टल

अल्फ्रेड पार्क चल रहा था विचार विमर्श:

भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद अब उन्हें फांसी दिए जाने की तैयारियां चल रही थी। चंदशेखर आजाद इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान थे। वह जेल तोड़कर भगत सिंह को छुड़ाने की योजना बना चुके थे, लेकिन भगत सिंह जेल से इस तरह बाहर निकलने को तैयार नहीं थे। परेशान चंदशेखर आजाद हर तरह से भगत को की फांसी रोकने का प्रयास कर रहे थे। आजाद अपने साथी सुखदेव आदि के साथ आनंद भवन के नजदीक अल्फ्रेड पार्क में बैठे थे। वहां वह आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना अंग्रेजों को दे दी गई। मुखबिरी मिलते ही अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को घेर लिया। अंग्रेजों की कई टुकड़ियां पार्क के अंदर घुस आई जबकि पूरे पार्क को बाहर से भी घेर लिया गया। उस समय किसी का भी पार्क से बचकर निकल पाना मुश्किल था, लेकिन आजाद यूं ही आजाद नहीं बन गए थे । अपनी पिस्टल के दम पर उन्होंने पहले अपने साथियों को पेड़ों की आड़ से बाहर निकाला और खुद अंग्रेजों से अकेले ही भिड़ गए । हाथ में मौजूद पिस्टल और उसमें रही 8 गोलियां खत्म हो गई। आजाद ने अपने पास रखी 8 गोलियों की दूसरी मैगजीन फिर से पिस्टल में लोड कर ली और रुक रुक कर अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे।

‘आजाद’ नाम से डरते थे अंग्रेज:

आजाद की ओर से गोलियां चलनी बंद हुई और लगभग आधे घंटे तक जब एक भी गोली नहीं चली तो अंग्रेज सिपाही धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, लेकिन आजाद का खौफ इस तरह था कि एक एक कदम आगे बढ़ने वाले सिपाही जमीन पर रेंगते हुए अब आजाद की ओर बढ रहे थे । आजाद के मृत शरीर पर जब अंग्रेजों की नजर पड़ी तो उन्होंने राहत की सांस ली , लेकिन अंग्रेजो के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर भी गोलियाँ चलाई गयी और जब अंग्रेज आश्वस्त हुये तब आजाद की मृत्यु की पुष्टि हुई। यह आज भी कयी किताबों में लिखा है कि आजाद की मुखबिरी एक बड़े नेता ने की थी और यह राज आज भी भारत सरकार के पास सुरक्षित फाइलों में दफन है।

शहीद आज़ाद की माँ जगरानी देवी

वो फोटो जिसके के लिए अंग्रेजों ने मारे कई छापे:

आजाद की मां चाहती थीं कि वो संस्कृत पढें और प्रकाण्ड विद्वान बनें। संस्कृत की पढ़ाई करने के लिए 12 साल की उम्र में आजाद बनारस गए। जहां पं. शिव विनायक मिश्र उनके लोकल गार्जियन की तरह थे। शिव विनायक मिश्र खुद उन्नाव से थे और आजाद के दूर के रिश्तेदार भी थ। पं. शिव विनायक मिश्र नगर कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी थे और बनारस के बड़े कांग्रेस नेताओं में से एक थे।

उन दिनों देश में गांधीजी का असहयोग आंदोलन जोरों पर था जिसमें आजाद ने भी हिस्सा लिया। गिरफ्तारी हुई और 14 बेंतो की सजा मिली। आजाद को जितनी बार बेंतें पड़ीं उतनी बार उनके मुंह से भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारे निकले। उस वक्त आजाद की उम्र 15 साल थी। बनारस में सेंट्रल जेल से निकलने के बाद आजाद का लोकल कांग्रेस लीडरशिप ने बनारस के ज्ञानवापी में हुए अभिनंदन समारोह में सम्मान किया। इस सम्मान समारोह में मिश्र ने आजाद की एक तस्वीर खिंचवाई।

आज़ाद की इस तश्वीर को हासिल करने के लिए अंग्रेज पुलिस ने पंडित शिव विनायक मिश्र के घर 5 बार छापा मारा था।

पं. शिव विनायक मिश्र के पोते सतीश मिश्र कहते हैं कि इस तस्वीर को हासिल करने के लिए अंग्रेज पुलिस ने उनके घर पर 5 बार छापा मारा लेकिन वो कामयाब नहीं हुई। क्योंकि पं शिव विनायक मिश्र ने आजाद की इस तस्वीर को घर के मंदिर में छिपा रखी थी, जिसे अंग्रेज ढूंढ नहीं पाए थे। ये तस्वीर आज भी उनके घर पर मौजूद है।

अंतिम संस्कार से जुड़ी कहानी:

पं. शिव विनायक मिश्र के पोते सतीश मिश्र के मुताबिक आजाद के अंतिम संस्कार में कमला नेहरू आईं थीं और उनको पता था कि पं. शिव विनायक मिश्र आजाद के करीबी हैं इसलिए उनको भी बुलवाया गया। इलाहाबाद में रसूलाबाद घाट पर अंतिम संस्कार किया गया।

1976 में आज़ाद की अस्थियां लेते शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के भाई सरदार कुलतार सिंह।

बाद में शिव विनायक मिश्र बची हुई अस्थियां लेकर बनारस आए। सरदार भगत सिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह 1974 में कांग्रेस के टिकट से सहारनपुर से एमएलए चुने गए थे। सूबे के सीएम नारायण दत्त तिवारी ने उन्हें खाद्य रसद और पेंशन राज्यमंत्री बनाया। 1976 में कुलतार सिंह ने बनारस जाकर पं शिवविनायक मिश्रा के घर से आजाद के अस्थि कलश को हासिल किया। कई शहरों में प्रोग्राम हुए, फिर उन्हें लखनऊ संग्रहालय में रख दिया।

Written by AU Beat Media

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Loading…

0

इविवि में अंतिम वर्ष के छात्रों को प्रमोट करने के लिए समाजवादी छात्रसभा के छात्रनेताओं का अनशन

छात्रावास खाली कराने पहुँचा इविवि प्रशासन, छात्रों के विरोध के बाद वापिस लौटना पड़ा