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“लल्ला चुंगी” का महत्व

यूनिवर्सिटी की सुबह जब एक हाथ में किताब लिए,लाइब्रेरी की किताबों में पूरा दिन बिताकर जब शाम की बारी आती है तो यूनिवर्सिटी सन्नाटे के आगोश में खो चुकी होती है,लाइब्रेरी की किताबें धुंधली पड़ने लगती हैं।ये समय वो होता है जब अधिकांश विद्यार्थी अपने-अपने कमरे में जाकर पढ़ने या रात के खाने की तैयारियों में जुट जाते है,तब एक नया सूरज उगता है,”लल्ला”

काग़ज़ों में तो इस जगह को “लल्ला चुंगी” लिखते हैं लेकिन अपने जरूरत और पसंद के हिसाब से नामकरण कर देने की आदत ने,या यूं कहे कि प्यार से इसे लल्ला कहा जाने लगा। लल्ला की मिठाई की दुकान ने ना जानें कितने अधिकारियों,नेताओं का खुशी के पलों में मुँह मीठा कराया होगा।हालांकि इसका नया नाम “लल्ला एंड संस” हो गया है,इसकी मिठाई की खुशबू हर शाम में मीठा सा एहसास छोड़ देती है,ठीक लल्ला के सामने खड़ी एक दो लग्जरी गाडियां,उन्हीं गाड़ियों में चलने वाले इलाहाबाद के लग्जरी छात्र नेता……….

लल्ला की सबसे खास बात ये है कि ये यह महिला छात्रावास के पास है और गेट के पास ना खड़े होकर लल्ला पर खड़े होकर,दोस्तो के साथ गुफ्तगू करते हुए किसी का इंतज़ार करना अजीब भी नहीं लगता और कुछ मुद्दों में चर्चा भी हो जाती है। लल्ला के अगल बगल दो रास्ते जाते है,एक वो जो थोड़ा आगे बढ़ कर छोटा बागाड़ा की ओर मुड़ जाता है और दूसरा वो जो बैंक रोड से होकर यूनिवर्सिटी की तरफ जाता है WH के पहले वाले रास्ते का मोड़ जहां चाय की चुस्की लेते हुए आपको यूनिवर्सिटी के सभी विचारक,नेता लोग मिल जाएंगे वहीं दूसरी ओर हॉस्टल से निकाल सब्ज़ी लेने जाती हुई हॉस्टल की हर लड़की देखने को मिल जाएगी। बताने का सारांश यह कि कभी दिन भर की किताबो की थकान उतारने का या कभी यह जानने की जिज्ञासा हो कि यूनिवर्सिटी की शाम कैसी होती है तो जरूर लल्ला की मिठाई खाने चले आइएगा।

हालांकि यह मेरे बताने से ज्यादा “ताराचंद छात्रावास” के छात्र और “महिला छात्रावास” की छात्राएं समझ सकती है,लल्ला का महत्व।एक और खास वर्ग के छात्र जो इसका महत्व ज्यादा समझते है वह हैं वो छात्र cum आशिक जो सिर्फ इस उम्मीद में अपनी शाम लल्ला में बिता देते है की शायद वो सब्ज़ी लेने,या फुल्की खाना बाहर निकले।

:आँचल

Written by AU Beat Media

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