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ये ‘इलाहाबाद’ है, ये ‘प्रयाग’ है

शामें लखनऊ जितनी मशहूर और सुबह वाराणसी जितनी पावन भले ही ना हो, भले ही ना हो यहाँ पर महानगरों जितनी चमक-दमक, पर एक अजीब सा आकर्षण है इस शहर में। पिज़्ज़ा, बर्गर, फ्राइज और पावभाजी से ज़्यादा बिकते हैं यहाँ पर ‘नेतराम की कचौरी’ और ‘देहाती रसगुल्ला’। सुबह नए ख़्वाब लाती है और चाय के नुक्कड़ पर शाम बीत जाती है। ‘गंगा’ और ‘यमुना’ एक दूसरे के गले ऐसे लगती हैं मानों दो बहनें अरसों बाद मायके आयी हों।
एक सदी से बूढ़ी दीवारों पर नए रंग भरता आ रहा है ‘ईस्ट का ऑक्सफ़ोर्ड’।
फ़िराक़ गोरखपुरी, निराला, हरिवंशराय बच्चन, धर्मवीर भारती, महादेवी वर्मा जैसे कई महान साहित्यकारों का गढ़ रहा है कभी ये शहर।

ये धरती है अमर शहीद ‘चंद्रशेखर आज़ाद’ के बलिदान की।
हाँ ये ‘इलाहाबाद’ है, ये ‘प्रयाग’ है।
बस इतनी सी ख्वाहिश है कि
“सुबह ‘निराला’ शाम को ‘फ़िराक़’ हो जाऊँ
महज़ इक दिन के लिए मैं ‘इलाहाबाद’ हो जाऊँ ”

– Garima Singh

Written by AU Beat Media

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