in

पहली रोटी

* पहली रोटी *

प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में मेरा बोरिया बिस्तर सहित पदार्पण हो चुका था। यूनिवर्सिटी में दाखिला हो गया था और बेली कॉलोनी में कमरा ले कर शिफ्ट हो गया था। शुरुआत में सब बड़ा अच्छा लगा, स्कूल की चहारदीवारी से बाहर यूनिवर्सिटी का खुला माहौल, कुछ भी करने की आज़ादी, घर के डर के बिना मनभर बाहर रहने और घूमने का सुख, ऐसा लग रहा था की मानो यही सब तो चाहिए था जीवन में।

यहां रहते 3 दिन हो गया। अब 3 दिन तो बाहर का खाना खा के गुजारा हो गया लेकिन ऐसा कब तक चलता। एक तो पैसा भी ज्यादा जा रहा था और दूसरे तबियत बिगड़ने के डर, तो निर्णय हुआ कि शाम को सब्जी-रोटी बनेगी। समान खरीद के आ गया था तो सब्जी बनाने के लिए माताजी को फोन हुआ। उन्होंने संक्षेप में सारी क्रियाविधि समझाई कुकर में आने वाली सीटियों के साथ आलू, टमाटर की सटीक गिनती और नमक के स्वादानुसार अनुमान भी नाप तोल के बता दिया। अंत में फोन रखते से पहले आटा गूथने और रोटी बनाने की प्रक्रिया का नम्बर आया।

“एक कटोरी आटा लेकर, हल्का हल्का पानी डालते हुए गूथ लो फिर हल्के हाथ से बेल कर धीमी आंच पर एक तरफ थोड़ा पकाओ फिर एक तरफ ज्यादा। अब तवा हटा के आंच तेज करो और रोटी को उलट पलट कर सेंक लो।” मम्मी के इतना कहते ही ऐसा लगा जैसे मास्टर शेफ जीतने का शॉर्टकट फार्मूला मिल गया हो। तुरन्त फोंन काट के इस नवीन ज्ञान के साथ भोजयुद्ध मे जुट गया। इस परम ज्ञान के बावजूद भी किसी तरह नमक और शुद्ध जल की बहुतायत के साथ सब्जी तो बन गई पर सबसे कठिन लड़ाई तो अब शुरू होने वाली थी।

आटा गूथा जा रहा था। बन्दर बिल्ली वाली लड़ाई की तरह आटे में कभी पानी ज्यादा हो जाये तो कभी उसे मैनेज करने के लिए डाला गया आटा। एक कटोरी आटे की जगह 3 कटोरी आटा खर्चने के बाद वो घड़ी आई जब उकता कर मैंने आटे को उसके गूथ जाने को सर्टिफिकेट दे दिया।

अब बेलने की बारी आई। समझ नहीं आ रहा था कि जब माँ रोटियां बेलती थीं तब तो वो गोल गोल घूमती थी पर मेरी तो बार- बार पीढ़े से चिपक जा रही थी। रोटी बनाने का हर स्टेप पहले स्टेप से ज्यादा कठिन साबित हो रहा था।थोड़ी ही देर में न जाने कौन-कौन से देश के नक्शे मेरे तवे पर सेंके जा रहे थे। आखिरकार मैं गर्व कर सकता था कि मैने अपने खाने भर की मोटी, कुछ अधपकी और कुछ जली रोटियां बना ली थीं। मैंने झटपट पेपर बिछाया, थाली कटोरी रखी, सदानीरा सब्जी कटोरी में डाल के पहला निवाला जैसे ही मुंह मे रखा तो इन 3 दिनों में पहली बार घर की सबसे ज्यादा याद आई।
कैसे खाने में थोड़ा भी कम-ज्यादा नमक होने पर मैं चिल्ला देता था? पर आज जैसे नमक में ही बनी सब्जी खा रहा था। सुबह नाश्ता मनपसंद न मिलने पर उसे छोड़ कर चला जाता था पर आज का खाना न पसन्द होने पर भी खाए जा रहा था। अभी थोड़ी देर पहले बनी दाल भी दुपहर में स्कूल से लौटने पर गर्म करके मिलती थी पर आज ठंडी रोटियां निगल रहा था। रात में खाने में थोड़ी भी देर हुई कि नखरे दिखाने लगता था पर आज ये सब करते-करते रात के खाने को 12 बज गए थे। आज वो सब बहुत याद आ रहा था और सबसे ज्यादा वो माँ के हाथ का खाना, वो तवे पर घूमती गोल गोल रोटियां और वो मेरा घर से यहां के लिए निकलना।

यही सब सोंचते सोंचते जाने कब आंसू आंखों में तैर गए। बमुश्किल डेढ़ रोटी खा पाया और बाकी का बचा आटा, सब्जी और रोटी थोड़ी देर बाद गाय खा रही थी।

अखण्ड

Written by AU Beat Media

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Loading…

0

इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे …

इलाहाबाद विश्वविद्यालय : इस जगह ने यादों की वो टोकरी दी है