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इलाहाबाद से प्रयागराज तक का सफर…

पिछले तीन वर्षों से इलाहाबाद में हूँ और इलाहबाद के बारे में कुछ भी लिखना मतलब अपने आज मे अपने कल को जीना। वैसे तो इलाहबाद का नाम बदल कर प्रयागराज हो गया लेकिन अपने 15/30 के कमरे में रहकर विद्यार्थी जीवन जीने वाले छात्र के लिए इलाहाबाद के जीवन मे कुछ बदला तो यह की एक कुकर की तीन सिटी में दाल ,चावल और चोखा कैसे बनाना है,यह कला सिखने का हुनर उसे यही आकर पता चला।इलाहबाद जहाँ 3000 रूपये से लेकर 6000 रुपये तक के कमरों में सैकड़ों ख़्वाबों को पालते हुए सुबह से शाम तक सम्समायकी और इतिहास -भूगोल की किताबों के पन्नो को पलटते हुए एक छात्र कैसे अपने जवानी के दिनों को बिता देता है इसका एक नायाब नमूना यही देखने को मिलता है और जब इस 15/30 के कमरे में घर से भेजे गए पैसे पर इलाहबाद में होने वाला खर्चा भारी पड़ने लगता है तब उसे जरुरत होती है एक पार्टनर की और इलाहबाद को छात्र की भाषा में समझे तो जहाँ जिंदगी शुरू होती हैं पार्टनेर्सिपिंग से वही इलाहबाद है। यहाँ दो साथ में रहने वाले लड़के बस रूम पार्टनर ही नहीं होते बल्कि वो एक साथ कटरा की बाजार से आधे दाम पर किताब खरीदनेसे लेकर छोटा-बघाड़ा की गलियों में छोटका खाली सिलिंडर को भी दोनों तरफ से बराबर पकड़ कर चलते हुए अपने बीच के लगाव को बखूबी दर्शा देते हैं।ये वही पार्टनर होते है जो तबियत खराब होने पर खाना बनाने के साथ कुकर भी धो देने जैसे कठिन कार्य दिसम्बर जैसे कट-कटाती ठण्ड में कर देते हैं।कहते है इलाहबाद में एक हवा बहती है upsc की ,अगर इलाहबाद आये और upsc का नशा एक बार भी नहीं चढ़ा तो समझना इलाहाबादी नशा चढ़ा ही नहीं है और बार-बार upsc नहीं निकलने पर,चलो upsc नहीं तो ssc ही सही का सूत्र देने वाले छात्र को ही असली पार्टनर कहते हैं।

कहते है कि छात्र जब इलाहाबाद पहली-पहली बार आता है तो साथ में एक बोरे में अपने महीने भर का राशन लेकर अपने माथे पर रखे हुए अपने कमरे पर आता है पर असल में वह दाल-चावल और आटा नहीं बल्कि वो लाखों सपनो का बोझ होता है जो उसके घर वाले उसके सहारे देखे होते हैऔर छात्र को भी अपने दृढ निश्चय पर भरोसा होता है कि एक दिन वो इन सभी सपनो को पूरा कर देगा।

जब 12वी की परीक्षा खत्म होने के बाद यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद या फिर किसी नयी वेकैंसी में जब छात्रों का एक नया खेप आता है ,जो अभिजीत बाबू के जैसे बलिया, सुल्तानपुर,देवरिया, गोंडा जैसे जिलों से आते है और प्रयागराज के “पिया मिलन चौराहा “pmc पे महिला छात्रावास के लोगों का अपने पिया के साथ जब मिलन देखते है और जैसे ही उन्हें यह ज्ञात होता है कि जिस चौराहे पर खड़े होकर वो चाय का लुफ्त उठाते हुए ऐसे दृश्यदेख रहे है उस चौराहे का नाम “pmc”हैं तो वो उन सीनियर छात्रों को उसी समय 100 तोपों की सलामी देते है जो इतना मंथन करने के बाद उस चौराहे का नाम करण किये होंगे ।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि किताबी ज्ञान तो कही भी मिल सकता है,परंतु एक छात्र को आटा, चीनी और दाल के दाम को भी जानना जरूरी है,जिससे वो समझ सके की कितनी मेहनत से उसे उसके घर दो वक्त की रोटी मिलती है,जो की बहुतों को नसीब नहीं होती ,आज यह किसी के लिए इलाहाबाद है तो किसी के लिए प्रयागराज परन्तु हमारे लिए तो आज भी वही है जो कल था जिसने हमे जीवन जीने का कला सीखा दिया।

अभिजीत

Written by AU Beat Media

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