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【…इलाहबाद…】

जैसे ही आपने दरवाजा खोला एक अजीब से गुसमुसाई हुई गन्ध ने आपका स्वागत किया..कमरे को देखकर ऐसा लग रहा है कि उसमें सदियों से सफाई जैसा कुछ भी नहीं हुआ है और सच कहिये तो वह कमरा कम अजूबाघर ज्यादा है।10-20 छिपकलियां , 100-200 मकड़ियां और ऐसे ही नाना प्रकार के जीव विचरण कर रहे होंगे..इन्हीं जन्तुओं के बीच आपको दिखाई देगा एक अद्भुत किस्म का प्राणी जो अभी अभी 1 कूकर भात-दाल-चोखा का सेवन कर के पसरा होगा। उसके चारों तरफ का वातावरण आपको एक साथ आदि,मध्य और आधुनिक काल का बोध कराएंगे। दीवाल के एक तरफ भारत और विश्व का मानचित्र तो दूसरी तरफ भारत का संविधान दिखाई देगा..बगल में तीन खूँटियों वाला हैंगर होगा जिसपर इतने कपड़े लदे होंगे की वह किसी भी वक़्त अपना दम तोड़ देगा। आपको कुछ किताबें भी दिख सकती हैं जैसे “Lucent” , “राजव्यवस्था”(लक्ष्मीकांत), “भौतिक भूगोल का स्वरूप”(सवींद्र सिंह), और इनका एक महाग्रंथ जिसे बगैर पढ़े ये खुद को जवान मान ही नहीं सकते-“गुनाहों का देवता”

बाकि किताबों पे जमी धूल पूरी कहानी खुद-ब-खुद बयां कर रही होगी।

कोने में आपको रसोईघर जैसा कुछ प्रतीत हो सकता है किन्तु उसे केवल रसोई घर समझने की भूल बिल्कुल भी न करें क्योंकि वह कार्यस्थल “सामाजिक समरसता” और “वर्ग सहयोग” का अद्भुत उदाहरण है। यहां प्रयोग में आने वाले पदार्थ जैसे तेल,टमाटर,जीरा,नमक आदि सप्ताह में 4 दिन दूसरों के कमरों से मांग कर आती हैं। जो जन्तु लेटा हुआ है उसने आज शाम को 120 रूपये की एक चप्पल खरीदी है और उसके उपलक्ष्य में वह आज भोज का आयोजन करने वाला है…शाम को वह Levis की पैंट(गन्दी इतनी है की चिप चिप कर रही है) पहनकर बाजार जायेगा और लौटते वक़्त उसके हाथों में 200 ग्राम पनीर और 10 रूपये की हरी मटर झूल रही होगी जिसे खाने के लिए 7-8 लोग जुटने वाले हैं और इन लोगों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है की ये लोग विशेषज्ञ हैं इस बात के की कम से कम संसाधन में भी अद्भुत समायोजन कैसे किया जा सकता है और दूसरी विशेषता होगी इनकी की इनमें सभी एक से बढ़ कर एक “थेथर और डिलरबाज” होंगे…किन्तु यकीन मानिये की आज आपको उस स्वाद का एहसास होने वाला है जो जीवन में दुर्लभ है।
अब आप पक्का यकीन कर सकते हैं कि जिस अजुबेघर में आप हैं वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थी का कमरा है और वो सभी जन्तु देश के भविष्य।

Note- लेखक नई कहानी आंदोलन से प्रभावित है जो की “भोगे हुए यथार्थ” पर बल देती है और यह पूरी रामायण भोगा हुआ यथार्थ है।

: Eklavya Rai

Written by AU Beat Media

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